- राजधानी में नगर निगम द्वारा पशुओं की अवैध ज़ब्ती और मनमाने जुर्माने के खिलाफ बहुआयामी राजनीतिक दल ने जिलाधिकारी को सौंपा ज्ञापन।
- अमली जामा पहनाने से पहले बिना वैकल्पिक व्यवस्था के चल रहे बुलडोजर पर तत्काल रोक लगाने की मांग।
- आरोप: “जनता को दूध, दही, घी सब चाहिए, लेकिन पशुपालक गद्दी समाज से परहेज—यह दोहरी मानसिकता नहीं चलेगी।”
लखनऊ, 20 अगस्त 2026:
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ सहित विभिन्न नगरों में पीढ़ियों से निवास कर रहे पारंपरिक पशुपालक गद्दी एवं गाजी समाज की आजीविका पर आए संकट को लेकर आज [आपके राजनैतिक दल का नाम] ने शासन और प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। दल के वरिष्ठ पदाधिकारियों ने आज लखनऊ के जिलाधिकारी, नगर आयुक्त और लखनऊ विकास प्राधिकरण (एलडीए) के उपाध्यक्ष को एक विस्तृत राजनीतिक ज्ञापन सौंपकर समाज के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करने की पुरजोर मांग की है।
राजनीतिक दल ने प्रशासन को चेतावनी देते हुए कहा है कि यदि नगर निगम द्वारा की जा रही अवैध वसूली, मवेशियों की जबरन ज़ब्ती और बिना किसी पुनर्वास के चलाई जा रही बुलडोजर कार्रवाई को तुरंत नहीं रोका गया, तो वे समाज के साथ मिलकर सड़कों पर बड़ा आंदोलन करने के लिए बाध्य होंगे।
आजादी के पहले से रहने वालों को बनाया जा रहा ‘अतिक्रमणकारी’
ज्ञापन के माध्यम से दल के नेतृत्व ने कहा कि लखनऊ के पुराने शहर, चौक, ठाकुरगंज, काकोरी और मलिहाबाद जैसे क्षेत्रों में अनुमानित 20 लाख से अधिक आबादी वाला गद्दी और गाजी समाज देश की आजादी के पहले से रह रहा है। उस समय ये इलाके आबादी से बाहर थे। लेकिन हाल के वर्षों में अनियोजित शहरीकरण और औद्योगीकरण के कारण बाहरी लोग आकर उनके आसपास बस गए। अब विडंबना यह है कि सदियों से शहर की पोषण सुरक्षा (दूध, दही, मक्खन और पनीर की आपूर्ति) सुनिश्चित करने वाले इस मूल समाज को ही “प्रदूषणकारी” और “अतिक्रमणकारी” बताकर प्रताड़ित किया जा रहा है।
पशुओं को ‘हाईजैक’ कर ₹50,000 तक की अवैध वसूली का आरोप
पार्टी ने नगर निगम के दस्तों पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि आए दिन गद्दी समाज के रिहायशी इलाकों और तबेलों पर छापेमारी की जाती है। दुधारू भैंसों और गायों को बलपूर्वक गाड़ियों में लादकर कांजी हाउस (पशु बाड़ों) में बंद कर दिया जाता है। इसके बाद गरीब पशुपालकों से ₹20,000 से लेकर ₹50,000 प्रति पशु तक की अनैतिक आर्थिक फिरौती (अवैध जुर्माना) वसूली जा रही है।
दल ने जमीनी सच उजागर करते हुए कहा कि एक तरफ पशुपालकों पर ‘पशु क्रूरता निवारण कानून’ (PCA Act) का झूठा पैनल लगाया जाता है, जबकि दूसरी तरफ असली क्रूरता सरकारी कांजी हाउसों में होती है, जहां भूख, प्यास और चारे-पानी के अभाव में कई दुधारू मवेशी दम तोड़ देते हैं।
संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 का खुला उल्लंघन
राजनैतिक दल ने इस प्रशासनिक कार्रवाई को पूरी तरह से असंवैधानिक करार दिया है। दल के प्रवक्ताओं ने कहा, “भारत का संविधान देश के प्रत्येक नागरिक को अपनी पसंद का व्यापार करने (अनुच्छेद 19(1)(g)) और सम्मान से जीने व आजीविका कमाने (अनुच्छेद 21) का मौलिक अधिकार देता है। सरकार एक तरफ कॉर्पोरेट और बड़ी कंपनियों को डेयरी उद्योग के लिए रियायतें दे रही है, वहीं पारंपरिक छोटे पशुपालकों के आशियानों पर बुलडोजर चलाकर समानता के अधिकार (अनुच्छेद 14) की धज्जियां उड़ा रही है।”
राजनैतिक दल की प्रमुख मांगें:
- आधुनिक डेयरी ज़ोन का निर्माण: लखनऊ के बाहरी इलाकों में अविलंब 500 से 1000 एकड़ भूमि चिन्हित कर आधुनिक ‘डेयरी ज़ोन’ बसाए जाएं, जहां गद्दी समाज को रियायती दरों पर बिजली, पानी और बाड़े आवंटित हों।
- कार्रवाई पर तत्काल मोराटोरियम (रोक): जब तक वैकल्पिक डेयरी ज़ोन पूरी तरह तैयार नहीं हो जाते, तब तक गद्दी-गाजी समाज के तबेलों पर किसी भी प्रकार की दंडात्मक या बुलडोजर कार्रवाई पर पूर्ण रोक लगे।
- पारदर्शी और ऑनलाइन शमन शुल्क: मवेशी पकड़े जाने पर वसूले जाने वाले जुर्माने को बेहद कम और युक्तिसंगत बनाया जाए ताकि भ्रष्टाचार खत्म हो सके।
- सामंजस्य समिति का गठन: स्वच्छता और गोबर प्रबंधन (बायो-गैस प्रोजेक्ट्स) के लिए नगर निगम के अधिकारियों और गद्दी समाज के प्रतिनिधियों की एक संयुक्त कमेटी बनाई जाए।
दल ने साफ शब्दों में कहा कि इस शांतिप्रिय और मेहनती समाज की जायज मांगों पर यदि 15 दिनों के भीतर सरकार ने सकारात्मक निर्णय नहीं लिया, तो देश के कानून और न्यायालय की शरण लेते हुए नगर निगम का घेराव किया जाएगा।
यदि आप इस समाचार प्रारूप में अपने दल के किसी विशिष्ट नेता या प्रवक्ता का नाम बयान (Quote) के रूप में जोड़ना चाहते हैं, तो कृपया मुझे बताएं ताकि इसे और अधिक प्रामाणिक बनाया जा सके।

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