
जन्माष्टमी पर्व के पूर्व संध्या पर विशेष विचार
जन्माष्टमी : जब कृष्ण जन्म लेते हैं, तब जीवन में प्रकाश उतरता है
आस्था से आत्मबोध तक—धर्म, समरसता, प्रकृति और ज्ञान का लोकपर्व
— प्रो. बिहारी लाल शर्मा
भारतीय संस्कृति में पर्व केवल उत्सव नहीं, बल्कि जीवन-मूल्यों को पुनः स्मरण करने के अवसर हैं। वे हमारी सांस्कृतिक स्मृति को जीवित रखते हैं और व्यक्ति को उसके कर्तव्य, समाज को उसकी संवेदना तथा प्रकृति को उसके प्रति उत्तरदायित्व का बोध कराते हैं। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी इसी विराट भारतीय चेतना का ऐसा पर्व है, जिसमें भक्ति के साथ दर्शन, आस्था के साथ विवेक और परम्परा के साथ लोकमंगल का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।
श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कन्ध तथा विष्णुपुराण आदि में वर्णित श्रीकृष्ण-जन्म भारतीय धार्मिक चेतना का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण प्रसंग है। मथुरा के कारागार में अन्धकार और अत्याचार के बीच कृष्ण का प्राकट्य भारतीय मानस में अधर्म के बीच धर्म, निराशा के बीच आशा और बन्धन के बीच मुक्ति के प्रकाश का प्रतीक बन गया है।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण का उद्घोष है—
“यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥”
और—
“परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥”
अर्थात् जब जीवन में धर्म-मूल्यों का ह्रास और अधर्म का उभार होता है, तब धर्म की पुनर्स्थापना के लिए दिव्य चेतना का प्राकट्य होता है। इस दृष्टि से जन्माष्टमी केवल कृष्ण के जन्म का उत्सव नहीं, बल्कि धर्म और मानवीय मूल्यों के पुनर्जागरण का पर्व है।
कृष्ण : जीवन को धर्ममय बनाने का दर्शन
श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व भारतीय दर्शन में इसलिए अद्वितीय है कि उसमें जीवन के अनेक आयाम एक साथ दिखाई देते हैं। वे बालक हैं तो निष्कपट आनन्द के प्रतीक हैं; गोपाल हैं तो प्रकृति और लोकजीवन से आत्मीय सम्बन्ध के; मित्र हैं तो प्रेम और विश्वास के; राजपुरुष हैं तो नीति और उत्तरदायित्व के; और कुरुक्षेत्र में अर्जुन के सारथी हैं तो कर्म, ज्ञान, भक्ति और आत्मबोध के महान् शिक्षक।
उनका कर्मयोग आज भी उतना ही प्रासंगिक है—
“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।”
कृष्ण हमें कर्म से पलायन नहीं, बल्कि कर्तव्यनिष्ठ कर्म की प्रेरणा देते हैं। वे बताते हैं कि जीवन की सफलता केवल उपलब्धि में नहीं, बल्कि कर्म की निष्ठा, शुचिता और लोकहित में भी निहित है।
कृष्ण और सामाजिक समरसता
कृष्ण का जीवन भारतीय समाज में आत्मीयता और समरसता का भी सशक्त संदेश देता है। उनका सम्बन्ध राजमहलों से है तो गोकुल के सामान्य जन से भी; वे सुदामा के मित्र हैं और विदुर के यहाँ प्रेमपूर्वक जाते हैं। कृष्ण की दृष्टि में मनुष्य की गरिमा उसके पद या सम्पत्ति से नहीं, उसके अन्तर्निहित मानवीय मूल्य से निर्धारित होती है।
गीता का “समदर्शिनः” का सिद्धान्त इसी व्यापक मानवीय दृष्टि को प्रतिष्ठित करता है।
आज जब समाज अनेक प्रकार के विभाजनों और तनावों से गुजर रहा है, जन्माष्टमी हमें स्मरण कराती है कि कृष्ण की आराधना तभी सार्थक है, जब हमारे व्यवहार में भेद के स्थान पर बन्धुत्व, वैमनस्य के स्थान पर संवाद और अहंकार के स्थान पर विनय दिखाई दे।
कृष्ण और प्रकृति : भक्ति से पर्यावरणीय चेतना तक
कृष्ण की लीलाभूमि यमुना, वन, गोवर्धन, गौ-समुदाय और ब्रज की प्राकृतिक संस्कृति से गहरे रूप में जुड़ी हुई है। श्रीमद्भागवत में कृष्ण-जन्म के प्रसंग में प्रकृति के मंगलमय वातावरण का अत्यन्त सुंदर वर्णन मिलता है।
आज के पर्यावरण-संकट के युग में कृष्ण-परम्परा का एक महत्त्वपूर्ण समकालीन पाठ यह हो सकता है कि प्रकृति केवल उपभोग की वस्तु नहीं, जीवन की सहचरी है।
गोवर्धन के प्रति श्रद्धा को आज हम प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और संरक्षण की चेतना से जोड़ सकते हैं। यमुना की पूजा के साथ उसकी स्वच्छता, वृक्षों के प्रति श्रद्धा के साथ वृक्षारोपण, गौ एवं जीव-जगत के प्रति करुणा के साथ जैव-विविधता की रक्षा और पर्व-उत्सव के साथ प्लास्टिक एवं अपशिष्ट नियंत्रण—यही आज की पर्यावरण-सम्मत जन्माष्टमी हो सकती है।
प्रकृति की आराधना तभी पूर्ण है, जब प्रकृति की रक्षा भी हमारे आचरण का हिस्सा बने।
आस्था के साथ वैज्ञानिक विवेक
भारतीय परम्परा में उपवास, संयम, ध्यान और जागरण का अपना आध्यात्मिक महत्त्व है। आधुनिक विज्ञान भी जीवन में अनुशासन, संतुलित आहार, स्वच्छता और मानसिक स्वास्थ्य के महत्त्व को स्वीकार करता है। परन्तु धार्मिक आचरणों को ऐसे वैज्ञानिक दावों से जोड़ना उचित नहीं है जिनके पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध न हों।
इसलिए जन्माष्टमी का वैज्ञानिक संदेश अंधविश्वास नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण आस्था होना चाहिए।
उपवास व्यक्ति की शारीरिक स्थिति के अनुकूल हो; स्वच्छता का ध्यान रखा जाए; अत्यधिक ध्वनि और भीड़ से होने वाली असुविधा से बचा जाए; भोजन की बर्बादी न हो; प्लास्टिक और प्रदूषण को न्यूनतम किया जाए—तो धार्मिक उत्सव सामाजिक उत्तरदायित्व का भी माध्यम बन सकता है।
विज्ञान हमें प्रमाण का सम्मान सिखाता है और अध्यात्म हमें जीवन के उद्देश्य का बोध कराता है; दोनों का समन्वय ही विवेकपूर्ण आधुनिकता का आधार बन सकता है।
काशी की ज्ञान-परम्परा और कृष्ण-दर्शन
काशी में जन्माष्टमी का अर्थ और भी व्यापक हो जाता है। काशी केवल तीर्थ नहीं, बल्कि भारत की अखण्ड ज्ञान-साधना की जीवंत राजधानी रही है। वेद, वेदान्त, न्याय, मीमांसा, व्याकरण, धर्मशास्त्र, ज्योतिष, साहित्य और दर्शन की दीर्घ परम्परा ने काशी को भारतीय ज्ञान-परम्परा का विशिष्ट केन्द्र बनाया है।
सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय इसी महान् परम्परा की आधुनिक शैक्षिक अभिव्यक्ति है।
कृष्ण का गीता-दर्शन भी ज्ञान को जीवन से जोड़ता है। उनके लिए ज्ञान केवल बौद्धिक संचय नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण कर्म और लोकसंग्रह की प्रेरणा है। इसलिए काशी की धरती पर कृष्ण का स्मरण हमें यह संदेश देता है कि ज्ञान ऐसा हो जो विवेक दे, विवेक ऐसा हो जो चरित्र बनाए और चरित्र ऐसा हो जो समाज एवं राष्ट्र के लोकमंगल में सहायक बने।
जन्माष्टमी : बाहर के कृष्ण से भीतर के कृष्ण तक
जन्माष्टमी का सबसे गहरा अर्थ शायद इसी प्रश्न में निहित है—
कृष्ण का जन्म कब हुआ—यह जानना महत्त्वपूर्ण है;
लेकिन हमारे भीतर कृष्ण का जन्म कब होगा—यह उससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण है।
जब हमारे भीतर सत्य के प्रति निष्ठा जागेगी, अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का साहस आएगा, मनुष्य के प्रति करुणा विकसित होगी, प्रकृति के प्रति संवेदना जागेगी, कर्म में निष्ठा और जीवन में संयम आएगा—तभी कृष्ण-चेतना का वास्तविक उदय होगा।
अतः जन्माष्टमी केवल मन्दिरों में दीप जलाने का पर्व नहीं; यह अपने अन्तर्मन में प्रकाश जलाने का पर्व है।
यह हमें सिखाती है कि धर्म केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि आचरण है; भक्ति केवल भाव नहीं, बल्कि सेवा है; ज्ञान केवल सूचना नहीं, बल्कि विवेक है; और संस्कृति केवल परम्परा नहीं, बल्कि जीवन को श्रेष्ठ बनाने की सतत साधना है।
आइए, इस जन्माष्टमी पर हम कृष्ण के जन्म का उत्सव मनाने के साथ अपने भीतर सत्य, प्रेम, करुणा, समरसता, विवेक और लोकमंगल की चेतना को जन्म देने का संकल्प लें।
यही कृष्ण को सच्ची श्रद्धांजलि होगी, यही भारतीय संस्कृति का सार है और यही जन्माष्टमी का शाश्वत संदेश भी।
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पावन पर्व पर समस्त देशवासियों, काशीवासियों, विद्यार्थियों, आचार्यों, शोधार्थियों तथा समाज के सभी वर्गों को हार्दिक मंगलकामनाएँ।
