एमडी न्यूज मंडल ब्यूरों कानपुर- शिवांगिनी अग्रवाल
कानपुर।पूरे देश में विजयादशमी यानी दशहरे के दिन रावण का पुतला जलाकर बुराई पर अच्छाई की जीत की खुशी मनाई जाती है, लेकिन कानपुर में एक अनोखी परंपरा है।यहाँ दशहरे पर शाम को रावण का पुतला जलाने से पहले उसकी बाकायदा पूजापाठ की जाती है. शिवाला इलाके में बना यह 200 साल पुराना रावण मंदिर साल में सिर्फ एक बार यानी सिर्फ दशहरे वाले दिन ही खुलता है। आज सुबह करीब 6:30 बजे मंदिर के कपाट खुलते ही श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। इसके बाद मंदिर और मूर्ति की सफाई कर रावण की प्रतिमा को घी, दूध, दही और जल से स्नान कराया गया।

मंदिर के पुजारी पंडित राम बाजपेयी बताते हैं कि हम लोग दशहरे के दिन कपाट खोलकर इनकी पूजा, अर्चना, अभिषेक और आरती करते हैं और शाम को पुतला दहन के बाद पट बंद कर देते हैं। मान्यता है कि रावण के पास अपार बल, बुद्धि और विद्या थी. जिसने नौ ग्रहों को वश में कर लिया हो उससे बड़ा विद्वान कोई नहीं हो सकता. इसलिए हम उनकी विद्वानता और विद्या की पूजा करते हैं. शाम को दहन उनके पुतले का नहीं, बल्कि उनके अहंकार का किया जाता है। पुरानी मान्यताओं के अनुसार, रावण बहुत बड़ा ज्ञानी और भगवान शिव का परम भक्त था. स्थानीय लोगों का कहना है कि यह मंदिर करीब 200 साल पुराना है. मंदिर में दर्शन करने आए श्रद्धालु जय सिंह ने बताया कि सामने बाबा भोलेनाथ का मंदिर है और बाहर 10 महाविद्याओं के रक्षक के रूप में रावण के मंदिर को स्थापित किया गया है. यहाँ पिछले कई सालों से लोग दर्शन के लिए आ रहे हैं.
पहली बार यहाँ उन्नाव जिले से दर्शन करने आए एक अन्य श्रद्धालु मोहित मिश्रा ने कहा कि सत्य और असत्य का चक्र हमेशा चलता रहता है और हम सब अहंकार का दहन करते हैं. शाम होते ही रावण की पूजा-आरती के बाद सामने मैदान में उसका पुतला जलाया जाता है और इसके तुरंत बाद मंदिर के कपाट सालभर के लिए फिर से बंद कर दिए जाते हैं।
