रिपोर्ट-रफीउल्लाह खान
लोकतंत्र की बुनियाद संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता और जनता की भागीदारी पर टिकी होती है। लेकिन जब ये संस्थाएं अपने कर्तव्य से डिग जाती हैं और सत्ता के आगे नतमस्तक हो जाती हैं, तो लोकतंत्र केवल दिखावा बनकर रह जाता है। यही कारण है कि जब बिहार में “वोटबंदी” के खिलाफ महागठबंधन ने चक्का जाम का आह्वान किया, तो आम लोग सड़कों पर उतर आए। यह महज़ राजनीतिक प्रदर्शन नहीं, बल्कि लोकतंत्र की रक्षा के लिए जनता का सामूहिक संकल्प था।

इस रैली को संबोधित करते हुए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और लोकसभा में प्रतिपक्ष के नेता राहुल गांधी ने साफ शब्दों में चेताया “संवैधानिक संस्थाओं में बैठे अधिकारियों को संविधान की मर्यादा के अनुसार काम करना चाहिए। हमारी सरकार बनी तो जो अधिकारी सत्ता के इशारे पर असंवैधानिक काम कर रहे हैं, उनके खिलाफ कानून सख़्ती से कार्रवाई करेगा।”
जनता की जागरूकता, लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताक़त
बिहार की जनता ने दिखा दिया कि लोकतंत्र में असली ताक़त जनता के हाथ में होती है। चक्का जाम में ग्रामीण, शहरी, छात्र, किसान, मज़दूर और महिलाएँ सभी शामिल हुए। उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि वोट की चोरी, पहचान की छेड़छाड़ और जनादेश की अनदेखी अब नहीं चलेगी।
चुनाव आयोग ने मतदाता सूची में नाम जुड़वाने के लिए 11 अलग‑अलग प्रमाणपत्रों की शर्त रख दी थी— जन्म प्रमाण पत्र, स्थाई निवास प्रमाण पत्र, जाति प्रमाण पत्र, हाई स्कूल की मार्कशीट, पासपोर्ट आदि। बिहार जैसे राज्य में, जहाँ करोड़ों गरीब और ग्रामीण लोगों के पास ये दस्तावेज़ नहीं हैं, यह शर्त लोकतांत्रिक अधिकार छीनने के बराबर थी।
परिणामस्वरूप लगभग पाँच करोड़ लोगों को नए सिरे से सरकारी दफ़्तरों की लंबी लाइनों में लगना पड़ रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने इस स्थिति को “मानव गरिमा के ख़िलाफ़ अनावश्यक बोझ” मानते हुए चुनाव आयोग को आईना दिखाया और सुझाव दिया कि—आधार कार्ड, राशन कार्ड और मौजूदा वोटर पहचान‑पत्र (EPIC) को भी 11 की सूची में जोड़ा जाए। ये तीनों काग़ज़ देश के सबसे वंचित तबकों तक भी पहुँच रखते हैं, इसलिए उन्हें प्राथमिकता देना स्वाभाविक न्याय है।
“वोटबंदी” कोई आधिकारिक शब्द नहीं, बल्कि उस प्रक्रिया के लिए प्रचलित उपमा है, जिसमें सुनियोजित ढंग से विपक्षी मतदाताओं के नाम सूची से गायब किए जाते हैं, पहचान पत्रों की वैधता पर सवाल उठाए जाते हैं और मतदान की निष्पक्षता कमज़ोर की जाती है। यह लोकतंत्र की आत्मा पर सीधा प्रहार है।
राहुल गांधी का बयान महज़ राजनीतिक घोषणा नहीं, बल्कि संविधान की रक्षा का संकल्प है। सुप्रीम कोर्ट का सुझाव इस संकल्प को न्यायिक समर्थन देता है। संविधानिक संस्थाएँ यदि जनता का भरोसा खो देंगी तो उनकी साख वापस पाना कठिन होगा। बिहार की सड़कों पर उमड़ी भीड़ ने दिखा दिया कि लोकतंत्र का असली पहरेदार आम नागरिक है। अब चुनाव आयोग पर है कि वह सुप्रीम कोर्ट की सलाह को अमल में लाकर मताधिकार को सुरक्षित करे, वरना इतिहास उसे माफ़ नहीं करेगा।
