धर्मेन्द्र कसौधन/राष्ट्रीय ब्यूरो
औरैया। शादी के बाद पारिवारिक विवाद, कथित प्रताड़ना, पुलिस कार्रवाई, न्यायालयी आदेश और डाक विभाग की रिपोर्टों को लेकर उठे सवालों ने एक महिला की करीब डेढ़ दशक लंबी कानूनी लड़ाई को गंभीर बना दिया है। गोरखपुर निवासी रीता चौहान का दावा है कि वर्ष 2008 में अजय कुमार सिंह पुत्र लल्लू सिंह से विवाह के बाद उनके वैवाहिक जीवन में विवाद शुरू हुआ। उन्होंने पति के एक अन्य महिला से कथित संबंधों का विरोध किया, जिसके बाद प्रताड़ना किए जाने का आरोप लगाया।
शिकायत के अनुसार, वर्ष 2010 में रीता को ससुराल से बाहर कर दिया गया। उस समय उनके साथ एक बच्चा था और वह गर्भवती थीं। उनका आरोप है कि मामले की शिकायत पुलिस से किए जाने के बाद समझौते का प्रयास किया गया, लेकिन कथित मारपीट के बावजूद उनका चिकित्सकीय परीक्षण नहीं कराया गया। इन परिस्थितियों को लेकर भी उन्होंने सवाल उठाए हैं।

2012 में न्यायालय की शरण
लगातार विवाद के बाद रीता ने वर्ष 2012 में न्यायालय का रुख किया। शिकायतकर्ता के अनुसार, मामले में वर्ष 2017 में भरण-पोषण से संबंधित आदेश पारित हुआ था। हालांकि उनका दावा है कि आदेश के बावजूद उन्हें अब तक उसका अपेक्षित आर्थिक लाभ नहीं मिल पाया है।
डाक विभाग की रिपोर्टों पर उठे सवाल
मामले का एक अहम पहलू न्यायालय से भेजे गए पत्रों और उनकी डिलीवरी रिपोर्ट से जुड़ा है। शिकायतकर्ता पक्ष का आरोप है कि संबंधित व्यक्ति द्वारा न्यायालय की डाक स्वीकार नहीं किए जाने के बावजूद कई बार डाक विभाग की रिपोर्ट में “पता गलत” दर्शाया गया।
रीता पक्ष का कहना है कि संबंधित लोग लंबे समय से उसी पते पर रहते रहे हैं। बाद में आधार कार्ड, डाक ट्रैकिंग और विभागीय स्तर पर की गई जानकारी के आधार पर वास्तविक पते को लेकर स्थिति स्पष्ट होने का दावा किया गया।
अब शिकायतकर्ता पक्ष की मांग है कि वर्षो से भेजी गई न्यायालयी डाक की जांच कर यह पता लगाया जाए कि किन परिस्थितियों में “पता गलत” की रिपोर्ट दर्ज की गई। साथ ही यह भी निर्धारित किया जाए कि इन रिपोर्टों का न्यायिक प्रक्रिया पर कितना प्रभाव पड़ा।
राजनीतिक दबाव के आरोप भी सामने आए
शिकायत में शुरुआती दौर में कथित राजनीतिक प्रभाव और दबाव का भी उल्लेख किया गया है। इसमें स्थानीय राजनीति से जुड़े कुछ लोगों के नाम तथा कथित राजनीतिक संबंधों का जिक्र किया गया है। हालांकि इन आरोपों और संबंधित व्यक्तियों की मामले में प्रत्यक्ष भूमिका की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है। ऐसे में इन दावों की निष्पक्ष जांच आवश्यक बताई जा रही है।
शादी में दिए सामान को लेकर भी विवाद
रीता के परिवार का कहना है कि विवाह के समय बेटी को परिवार की ओर से बेड, बाइक, टीवी, फ्रिज, सोफा सहित घरेलू उपयोग का सामान दिया गया था। शिकायतकर्ता पक्ष का दावा है कि इनमें से कई सामान अभी भी उसी घर में मौजूद हैं।
परिवार के पास सोशल मीडिया से प्राप्त एक वीडियो होने की बात भी कही गई है, जिसमें कथित रूप से अजय कुमार सिंह और नीतू कुमारी साथ दिखाई दे रहे हैं। वीडियो में दिखाई देने वाले लोगों की पहचान और वीडियो की वास्तविकता की स्वतंत्र पुष्टि फिलहाल नहीं हुई है।
परिवार का सबसे भावनात्मक दावा उस बेड को लेकर है, जिसे रीता के पिता ने बेटी की शादी के लिए बनवाकर दिया था। उनका कहना है कि बेटी वर्षों पहले ससुराल से अलग हो गई, लेकिन पिता द्वारा दिया गया सामान वहीं रह गया।
अब उठ रहे हैं जवाबदेही के सवाल
करीब 14 वर्षों से चल रही इस कानूनी लड़ाई ने कई सवाल खड़े किए हैं। शिकायतकर्ता पक्ष जानना चाहता है कि शुरुआती पुलिस कार्रवाई क्या थी, कथित मारपीट के बाद मेडिकल परीक्षण क्यों नहीं कराया गया, न्यायालय से भेजी गई डाक पर बार-बार “पता गलत” की रिपोर्ट किस आधार पर दर्ज हुई और वर्ष 2017 में पारित भरण-पोषण आदेश का प्रभावी अनुपालन अब तक क्यों नहीं हो सका।
फिलहाल इन आरोपों की स्वतंत्र और आधिकारिक पुष्टि होना बाकी है। ऐसे में मामले से जुड़े पुलिस रिकॉर्ड, न्यायालयीन दस्तावेज, डाक विभाग की रिपोर्ट और संबंधित पक्षों के बयान सामने आने के बाद ही पूरी तस्वीर स्पष्ट हो सकेगी।
रीता चौहान की वर्षों पुरानी लड़ाई अब केवल वैवाहिक विवाद तक सीमित नहीं रह गई है। मामला इस सवाल तक पहुंच गया है कि न्यायालय से आदेश मिलने के बाद उसे वास्तविक रूप से लागू कराने में इतनी लंबी देरी क्यों हुई। यदि शिकायत में लगाए गए आरोप और दस्तावेज जांच में सही पाए जाते हैं, तो यह मामला संबंधित विभागों की जवाबदेही और न्यायिक आदेशों के प्रभावी अनुपालन पर गंभीर सवाल खड़े कर सकता है।
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