रिपोर्टर राजकुमार

बहुआयामी समाचार
एम डी न्यूज़ खैर अलीगढ़

निर्वाचन आयोग ने देश के 12 राज्यों में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण कार्यक्रम (SIR) की समय सीमा को एक सप्ताह बढ़ाकर 11 दिसंबर कर दिया है। यह विस्तार एक आवश्यक कदम है, लेकिन यह आयोग के जल्दबाज़ी भरे और दबावपूर्ण दृष्टिकोण को सही नहीं ठहराता। यह ‘रस्सी जल गई, पर बल नहीं गए’ वाली कहावत को चरितार्थ करता है।

  • सवाल है, यह हड़बड़ी क्यों?
    विपक्ष शुरू से ही इस गहन प्रक्रिया को पूरे देश में लागू करने की जल्दबाज़ी पर सवाल उठा रहा है। 51 करोड़ मतदाताओं के नाम, पते और उम्र की जाँच करना कोई चंद दिनों का काम नहीं है। इसके लिए पर्याप्त मानव संसाधन, समुचित प्रशिक्षण और सबसे ज़रूरी, पर्याप्त समय चाहिए।

कटु सत्य यह है कि इस प्रक्रिया को निपटाने की ज़बरदस्त हड़बड़ी ने इसे जानलेवा बना दिया है। पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों से बूथ स्तर के अधिकारियों (BLOs) की आत्महत्या के मामले सामने आना कोई साधारण घटना नहीं है। एक संवैधानिक प्रक्रिया को लागू करने का यह कौन सा असामान्य तरीका है?

  • BLOs की त्रासदी
    ज़्यादातर BLOs स्कूल शिक्षक या सरकारी कर्मचारी हैं। उन पर औसतन हज़ार से बारह सौ मतदाताओं तक पहुंचने का दबाव है। घर-घर जाना, फॉर्म बांटना, इकट्ठा करना और उनका डिजिटाइजेशन करना एक दुसाध्य प्रक्रिया है। बीएलओ को नौकरी से निकालने, वेतन काटने या प्राथमिकी दर्ज करने की धमकियाँ मिलने के आरोप इस प्रक्रिया की अमानवीयता को उजागर करते हैं। पश्चिम बंगाल में आत्महत्या करने वाली बीएलओ रिंकू तरफदार का यह लिखना कि उन्हें प्रशिक्षण नहीं मिला, तकनीकी समस्याएं थीं, और ऑनलाइन फॉर्म जटिल थे—यह बताता है कि दबाव केवल काम पूरा करने का नहीं था, बल्कि अव्यवस्था और अपर्याप्त संसाधनों के बीच काम करने का था।

2003 में जब SIR हुआ था, तब ऐसी त्रासद घटनाएँ सामने नहीं आई थीं। आज यह हो रहा है, तो ज़ाहिर है कि व्यवस्था में एक गंभीर खामी है, जिसे आयोग लगातार अनसुना कर रहा है।

  • एक सप्ताह का विस्तार: मज़ाक या मलमपट्टी?
    विपक्ष लगातार इस प्रक्रिया को टालने या कम से कम 3 से 5 महीने का अतिरिक्त समय देने की मांग कर रहा था। आयोग ने केवल एक सप्ताह बढ़ाया है। यह बचाव कि विस्तार “चुनाव अधिकारियों को मसौदा सूची प्रकाशित करने के लिए अतिरिक्त समय देने के लिए किया गया है,” भ्रामक है। यह दबाव को कम करने का पर्याप्त उपाय नहीं है।

अगर आयोग सचमुच ‘कोई योग्य मतदाता बाहर न रहे और कोई अपात्र नाम न रहे’ सुनिश्चित करना चाहता है, तो उसे इत्मीनान से काम करने के लिए पर्याप्त समय देना चाहिए। केवल 3 से 5 महीने बढ़ाकर ही एक ऐसी पुख़्ता मतदाता सूची तैयार की जा सकती थी जिसमें गड़बड़ी की गुंजाइश नाममात्र की हो।

  • वोट चोरी का आरोप बेबुनियाद नहीं
    SIR का उद्देश्य चाहे जो भी बताया जाए, विपक्षी दल इसे ‘वोट चोरी’ का हथियार मानते हैं। मुंबई में नगरीय निकाय चुनाव से पहले 11 लाख डुप्लीकेट मतदाताओं (कुल का 10.64 प्रतिशत) का पता चलना विपक्ष के आरोपों को बल देता है। यह संख्या बताती है कि फर्जी मतदाताओं का मसला बेबुनियाद नहीं है।

आयोग को इस पर जवाब देना चाहिए कि लोकसभा चुनावों से पहले SIR क्यों नहीं करवाया गया? 2003 के बाद अब 22 साल बाद ही इस प्रक्रिया को क्यों लाया गया? और सबसे महत्वपूर्ण—जब संवैधानिक प्रक्रिया को लागू करने में कर्मचारियों की जान जा रही है, तो उसकी आपत्तियों को इतनी हठधर्मिता के साथ अनसुना क्यों किया जा रहा है?

यह केवल प्रशासनिक विस्तार का मामला नहीं है, यह लोकतंत्र की बुनियाद और उन सरकारी कर्मचारियों की जान का मामला है जो इस बुनियाद को बचाने में लगे हैं। चुनाव आयोग को अपनी हठ छोड़कर प्रक्रिया को मानवीय और व्यवस्थित बनाने के लिए तुरंत और पर्याप्त समय देना चाहिए।

SIR (Special Intensive Revision) के अत्यधिक काम के दबाव के कारण बूथ-लेवल अधिकारियों (BLOs) की आत्महत्या और उससे संबंधित अन्य मौतों की कई खबरें सामने आई हैं।

यहाँ राज्यों के अनुसार प्रमुख मामले और आरोप दिए गए हैं:

  1. उत्तर प्रदेश (UP)
  • मुरादाबाद: BLO सर्वेश सिंह (45) ने फांसी लगाकर जान दे दी। उन्होंने अपने सुसाइड नोट में लिखा कि वह अपना टारगेट पूरा नहीं कर पा रहे हैं और रात में केवल 2-3 घंटे ही सो पा रहे हैं। उन्होंने काम के बारे में पूर्ण जानकारी न होने और मानसिक संतुलन बिगड़ने का जिक्र किया।
  • गोंडा: BLO विपिन यादव ने जहर खाकर आत्महत्या की थी। जहर खाने से पहले एक वीडियो में उन्होंने SIR कार्य को लेकर अधिकारियों पर अत्यधिक दबाव और धमकी का आरोप लगाया था।
  • अन्य मामले: एक अन्य मामले में, कथित तौर पर मेंहदी की रस्म वाले दिन कानूनगो के घर पहुंचकर ड्यूटी में लापरवाही बताने और सस्पेंशन की धमकी देने के कारण एक शिक्षक ने आत्महत्या कर ली थी। बरेली में BLO संतोष कुमार गंगवार की SIR फॉर्म वितरण के दौरान मौत हो गई, जिसके लिए परिवार ने अत्यधिक कार्य दबाव को जिम्मेदार ठहराया।
  • राजनीतिक आरोप: आम आदमी पार्टी के सांसद डॉ. संजय सिंह ने आरोप लगाया है कि चुनावी घोटाले के चक्कर में 26 BLOs की जान चली गई है और उन्होंने मृतकों के परिवारों के लिए ₹1 करोड़ का मुआवज़ा और सरकारी नौकरी की मांग की है।
  1. पश्चिम बंगाल (West Bengal)
  • नादिया (Nadia): BLO रिंकू तरफदार (53) ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। उनके परिवार ने SIR-संबंधित काम के असहनीय तनाव को उनकी मौत का कारण बताया। उनके सुसाइड नोट में भी निर्धारित समय सीमा के भीतर काम पूरा न कर पाने के भारी दबाव का ज़िक्र था।
  • जलपाईगुड़ी (Jalpaiguri): एक आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, जो BLO थीं, ने भी कथित तौर पर SIR के अत्यधिक दबाव के कारण आत्महत्या कर ली थी।
  • अन्य मौतें: पुरबा बर्धमान जिले में एक BLO की ब्रेन हैमरेज से और मुर्शिदाबाद में एक BLO ज़ाकिर हुसैन की कार्डियक अरेस्ट से मृत्यु हो गई। परिवार ने दोनों ही मामलों में SIR ड्यूटी और नियमित शिक्षण कार्य को एक साथ निभाने के जबरदस्त दबाव को मौत का कारण बताया।
  • सरकारी प्रतिक्रिया: मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इन मौतों को लेकर सवाल उठाए हैं और SIR प्रक्रिया को रोकने की मांग की थी।
  1. गुजरात
  • गिर सोमनाथ: एक शिक्षक, जो BLO भी थे, ने SIR के काम के दबाव में आत्महत्या कर ली। उन्होंने अपने सुसाइड नोट में थकान और मानसिक तनाव का उल्लेख किया था। इस घटना से शिक्षक समुदाय में आक्रोश पैदा हुआ।
  1. तमिलनाडु (Tamil Nadu)
  • कल्लाकुरिची (Kallakurichi): एक महिला BLO ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। उनके पति और सहयोगियों ने बताया कि वरिष्ठ अधिकारियों और राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों द्वारा SIR कार्य को जल्दबाज़ी में पूरा करने के लिए दबाव डाला जा रहा था। उन्होंने कम डिजिटल कनेक्टिविटी के कारण टारगेट पूरा न कर पाने की चिंता व्यक्त की थी।

अन्य राज्यों से संबंधित मामले

  • केरल और राजस्थान में भी BLOs के अत्यधिक काम के बोझ और अनुचित लक्ष्यों के कारण मौतों और विरोध प्रदर्शनों की खबरें आई हैं।
  • एक रिपोर्ट के अनुसार, 27 दिनों में SIR से जुड़ी 41 मौतों के दावे किए गए हैं, जिनमें से कई आत्महत्या या अत्यधिक तनाव से हुए कार्डियक अरेस्ट के कारण बताई गई हैं।

चुनाव आयोग (ECI) का पक्ष

  • ECI ने सुप्रीम कोर्ट में इन आरोपों का कड़ाई से खंडन किया है। आयोग ने BLOs की आत्महत्या और बड़े पैमाने पर मतदाताओं के बहिष्करण के दावों को “झूठा, बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया और राजनीतिक रूप से प्रेरित” बताया है।
  • ECI का कहना है कि SIR, डुप्लीकेट और पुराने नामों को हटाने के लिए आवश्यक है, और राजनीतिक हितों द्वारा मीडिया में भ्रामक नैरेटिव बनाया जा रहा है।
  • ECI ने यह भी कहा कि काम का दबाव कम करने के लिए ही संक्षिप्त समय-सीमा तय की गई है, ताकि BLOs जल्द से जल्द अपने नियमित कार्यों पर लौट सकें।

SIR प्रक्रिया के तहत BLOs पर असाधारण और अमानवीय कार्यभार था, जिसके चलते कई राज्यों में BLOs की आत्महत्याएँ और काम के दबाव से जुड़ी अन्य मौतें हुई हैं। भले ही ECI आरोपों को खारिज कर रहा हो, जमीनी हकीकत, खासकर सुसाइड नोट्स और पारिवारिक बयानों से मिली जानकारी, एक गंभीर संकट की ओर इशारा करती है।

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